पेड मीडिया कैसे काम करता है, और इसके प्रायोजक कौन है?

पेड मीडिया कैसे काम करता है, और इसके प्रायोजक कौन है?



लोकतंत्र आने से पहले राजा बाहुबल-सैन्यबल से सत्ता में आता था, और वास्तव में राज्य को कंट्रोल करता था। राजा की शक्ति का स्रोत सेना थी, और धनिक वर्ग का सेना पर कोई नियंत्रण नहीं था। इसके अलावा अदालतें भी पूर्णतया राजा के अधीन थी। यदि धनिकों के सम्बन्ध राजा से बिगड़ जाते थे तो राजा को निष्कासित करने के लिए साजिश / हत्या आदि के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं था। तब वे किसी ऐसे व्यक्ति को सहयोग देना शुरू करते थे जो राजा का तख्ता पलट सके।

लेकिन मताधिकार आने के बाद राज्य के नागरिको की राय निर्णायक बन गयी। नागरिको की राय जिस व्यक्ति के पक्ष में होगी, वह राजा बनने लगा। पेड मीडिया नागरिको की राय बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण है, अत: धनिकों ने मीडिया को फैलाना और इसे नियंत्रित करना शुरू किया। मुख्यधारा के मीडिया पर धनिक वर्ग का हमेशा से नियंत्रण रहा है, और आज भी पूर्ण रूप से वे ही इसे नियंत्रित करते है।

व्यवसायिक रूप से पेड मीडिया एक घाटे का व्यवसाय है। किन्तु राजनैतिक फायदे के लिए धनिक वर्ग मीडिया समूहों का घाटा उठाते है। मीडिया के माध्यम से जब कोई सूचना दी जाती है तो यह देश के करोड़ो नागरिको की राय को प्रभावित करती है। पेड मीडिया को नियंत्रित करके वे नागरिको की राजनैतिक राय को प्रभावित करते है। चूंकि राजनेता चुनाव जीतने एवं अपनी छवि बनाये रखने के लिए पेड मीडिया पर निर्भर करते है, अत: नागरिको की राय को प्रभावित करने के कारण वे राजनेताओं को नियंत्रित कर पाते है। और राजनेताओ को नियंत्रित करके वे उन क़ानूनो को गेजेट में प्रकाशित करवा पाते है जो धनिक वर्ग को अतिरिक्त मुनाफा दे !! दुसरे शब्दों में, जो वर्ग पेड मीडिया को नियंत्रित करता है, उसके पास राजनेताओं के फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता भी आ जाती है।

एक गलत धारणा यह है कि, पेड मीडिया में सिर्फ अख़बार एवं न्यूज चेनल्स ही शामिल है। दरअसल, पेड मीडिया का दायरा काफी विस्तृत है। इसमें सूचनाएं देने के सभी केन्द्रीय स्त्रोत शामिल होते है। पाठयपुस्तको से लेकर, मनोरंजक फिल्में और साहित्य तक सभी केन्द्रीय स्त्रोत पेड मीडिया के अंतर्गत है।


(1) पेड मीडिया के अंग :


कक्षा 1 से स्नातकोत्तर तक की सामाजिक विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीती विज्ञान, लोक प्रशासन की सभी पाठ्य पुस्तकें पेड पाठ्य पुस्तके है। किन्तु गणित एवं विज्ञान की पुस्तकें पेड नहीं है।

मुख्य धारा (Main Stream) की सभी फ़िल्में, धारावारिक, वृत्त चित्र आदि पेड मीडिया है। 

समाज-राजनीती-अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों द्वारा लिखी गयी मुख्य धारा की सभी पुस्तकें पेड पुस्तके है। यदि इन विषयों पर लिखी गयी किसी पुस्तक को पुरूस्कार मिला है तो यह डबल पेड (Double Paid) है। 

मुख्य धारा के सभी अख़बार, मनोरंजन चैनल, न्यूज चेनल पेड मीडिया है। 

टीवी-अखबार में आने वाले सभी बुद्धिजीवी पेड बुद्धिजीवी है। सभी पत्रकार पेड पत्रकार है। सभी सम्पादक पेड सम्पादक है। सभी कानून-संविधान आदि विशेषग्य पेड विशेषग्य है। 

मुख्य धारा की सभी राजनैतिक पार्टियाँ पेड मीडिया पार्टियों एवं उनके शीर्ष नेता पेड नेता (Paid Leader) है। 

मुख्य धारा में मॉस मीडिया (Mass Media) से संबधित प्रसारण के सभी केन्द्रीय स्त्रोत। 


तो व्यक्ति की राजनैतिक सूचनाओ का बुनियादी स्त्रोत पेड मीडिया है। यह कभी सही है कभी गलत है। लेकिन नागरिको के राजनैतिक विमर्श को पेड मीडिया सबसे गहराई तक जाकर प्रभावित करता है।


(2) मीडिया को पेड मीडिया (Paid Media) क्यों कहा जाता है ?

मुख्य धारा (Main Stream) मीडिया में आप जो कुछ भी देखते-सुनते-पढ़ते हो उसमें से ज्यादातर 4 स्थितियों में प्रसारित होता है :

इसके लिए किसी के द्वारा भुगतान (Pay) किया गया हो, किन्तु यह सामग्री पेड मीडिया के प्रायोजको* के हितो के प्रतिकूल न हो।

इसमें मनोरंजन मूल्य (Entertainment value) हो, किन्तु यह सामग्री पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के प्रतिकूल न हो। 

अमुक प्रसारण पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के अनुकूल हो।

यदि छिपाई जाने वाली कोई सूचना नागरिको में फैल चुकी हो, और मीडिया पर इसे दिखाने का दबाव बनने लगे। 


(क) पेड मीडिया के प्रायोजक - वे समूह जो पेड मीडिया को निर्णायक रूप से नियंत्रित करते है। भारत में पेड मीडिया के । प्रायोजक अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माता कम्पनियों के मालिक है। अत: ऊपर पेड मीडिया के जो 7 अंग बताए गए है. उनमे से किसी भी माध्यम में बहधा वह सामग्री प्रसारित नहीं होती जो अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माताओ के हितो के खिलाफ हो। क्यों और कैसे अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माता पेड मीडिया को नियंत्रित करते है, इसका विवरण अन्य अध्यायों में दिया है।


(2.1) ऐसे प्रसारण जिनके लिए भुगतान किया जाता है ( और यदि ये सामग्री पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के प्रतिकूल नहीं है)

चूंकि पेड मीडिया में आने वाले सभी प्रकार के प्रसारणों के लिए भुगतान (Payment) किया जाता है, अत: इसे पेड मीडिया, एवं प्रसारित होने वाली सामग्री को पेड न्यूज एवं पेड व्यूज़ (Paid news & Paid Views) कहा जाता है। यहाँ सबसे जरुरी बात यह है कि - जब पेड मीडिया सच्ची और अच्छी ख़बरें दिखाता है तब भी इसके लिए किसी न किसी के द्वारा भुगतान किया जाता है।

इसे फिर पढ़िए - जब पेड मीडिया सच्ची और अच्छी ख़बरें दिखाता है तब भी इसके लिए किसी न किसी के द्वारा भुगतान किया जाता है !!

इस श्रेणी में पेड मीडिया में जो भी प्रसारण आता है उसकी पेमेंट की जाती है। उदाहरण के लिए यदि कोई नेता वाकयी ईमानदार है और मीडिया रिपोर्ट कर रहा है कि वह ईमानदार है तो इसके लिए किसी न किसी ने इसके लिए पेमेंट की है। यदि कोई उद्योगपति बेईमान है और मीडिया रिपोर्ट कर रहा है कि उसने इतनी उतनी टेक्स चोरी की है, तो टेक्स चोरी सच्चाई है, लेकिन यह खबर मीडिया में प्रमुखता से सिर्फ तब आएगी जब कोई न कोई इस खबर को दिखाने के लिए पेमेंट करें।

यदि पेड मीडिया में यह रिपोर्ट हो रहा है कि बेरोजगारी बढ़ रही है, तो इसके लिए भी पेमेंट की जायेगी। और यदि उसी दिन किसी अन्य मीडिया में यह आया है कि बेरोजगारी घट रही है तो इसके लिए भी पेमेंट हुयी है। और मीडिया के सम्पादक, पत्रकार, मीडियाकर्मी आदि यह बात हमसे छिपाते है कि उन्हें अमुक खबर प्रमुखता से दिखाने के लिए पेमेंट किसने की है।

पेड मीडिया के इन सभी स्त्रोतों में विज्ञापनो की स्थिति अलग है। क्योंकि जब हम अमूल का विज्ञापन देखते है तो हमें यह पता होता है कि विज्ञापन की पेमेंट अमूल ने की है। लेकिन विज्ञापन के अलावा भी आप जितनी भी ख़बरें देखते है उन खबरों के प्रसारण के लिए भी पेमेंट की जा रही है, और हमें पता नहीं है कि इसकी पेमेंट कौन कर रहा है !!


पत्रों में सिर्फ विज्ञापन ही सच्चे होते है - थोमस जेफरसन , अमेरिका के तृतीय राष्ट्रपति 1810समाचार 


सभी राजनैतिक ख़बरों के लिए भुगतान किया जाता है, और सबसे अधिक भुगतान उन खबरो के लिए किया जाता है, जिन्हें दिखाना बेहद जरूरी था, किंतु नही दिखाया गया- जेफरसन , 1820.


(2.2) ऐसे प्रसारण जिनमें मनोरंजन हो। ( और यदि ये सामग्री पेड मीडिया प्रायोजको के हितो के प्रतिकूल न हो)

मीडिया में कई सामग्री ऐसी भी होती है, जिनमे मनोरंजन (Entertainment) होता है। उदाहरण के लिए, किसी फिल्म स्टार का चित्र या किसी सेलिब्रिटी आदि से जुडी कोई चटपटी सामग्री। दर्शको का एक विशाल वर्ग मनोरंजन सामग्री का ग्राहक है। अत: कुछ मामलो में मनोरंजक सामग्री का प्रसारण जगह भरने के लिए मुफ्त में भी कर दिया जाता है। इस श्रेणी में नग्नता, हिंसा, फूहड़ता, अश्लीलता, वैमनस्य, उद्दीपन, नशा आदि को प्रोत्साहित करने वाली मनोरंजक सामग्रियां प्रमुखता से हो सकती है। किन्तु मनोरंजन सामग्री का प्रसारण भी सिर्फ तब होगा जब यह सूचना पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के खिलाफ ना हो। उदाहरण के लिए यदि किसी सामग्री में शालीन मनोरंजन है तो प्रसारण मुफ्त में नहीं किया जायेगा, और इसके ऊंचे दाम चुकाने होंगे।


(2.3) यदि अमुक प्रसारण पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के अनुकूल हो।

यदि कोई सूचना या सामग्री पेड मीडिया के हितो के अनुकूल है तो उनका प्रसारण बिना किसी भुगतान के भी किया जाता है। ऊपर दी गयी 2 श्रेणियों के अतिरिक्त पेड मीडिया में आप खबरों या अन्य विवरणों के बारे में जो भी देखते-पढ़ते है, वे सभी सामग्रियां इसी श्रेणी की होती है। इसमें मुख्यतया ख़बरें दिखाने के नाम पर ख़बरें छुपाना, टाइम पास खबरें दिखाना, और प्रोपेगेंडा आदि शामिल है।


(2.4) कई बार ऐसा भी होता है कि कोई सूचना पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के खिलाफ है. किन्त किन्ही अन्य स्रोतों से यदि अमक सूचना नागरिको के एक वर्ग में फैल चुकी है तो पेड मीडिया द्वारा अपनी छवि बनाये रखने के लिए इसका प्रसारण बिना किसी भुगतान के भी कर दिया जाता है। क्योंकि यदि वे तब भी इसका प्रसारण नहीं करेंगे तो दर्शको में अपना प्रभाव खो देंगे।


(3) मीडिया समूह पैसा कैसे बनाते है ?

एक आम धारणा यह है कि टीवी-अख़बार विज्ञापन से पैसा बनाते है। जबकि सच्चाई यह है कि टीवी-अख़बार जो कुछ भी दिखाते है , उससे पैसा बनाते है। इसे और भी स्पष्ट रूप से यूँ कह सकते है कि किसी मीडिया समूह की टीवी स्क्रीन-अखबार का पृष्ठ एक प्लाट है जो कि प्रसारण के लिए उपलब्ध है। जिसे जो भी विषय वस्तु दिखानी है, वह उसके लिए पैसा देगा और बतायेगा कि इस विषय को इस तरह दिखाना है। और वह यह भी बतायेगा कि इस विषय को खबर के रूप में दिखाना है, या विज्ञापन के रूप में दिखाना है, आदि आदि। मीडिया समूह उससे पैसा लेगा, और विषय वस्तु इस तरह के कलेवर में पेश कर देगा कि पैसा देने वाले व्यक्ति का उद्देश्य पूरा हो जाए।


उदाहरण के लिए -- जब आप टीवी पर 30 मिनिट का कोई साक्षात्कार (Interview) देखते है, तो 30 मिनिट के साक्षात्कार में 5 मिनिट के विज्ञापन दिखाए जाते है। आप जानते है कि 5 मिनिट के विज्ञापन के लिए अमुक कंपनी ने 50 लाख का भुगतान किया गया होगा। लेकिन जो बात आप नही जानते वो यह है कि शेष 25 मिनिट में जो साक्षात्कार आप देख रहे है, उसके लिए अमुक चैनल को 5 करोड़ रूपये चुकाए गए है !! इस तरह असली विज्ञापन बह साक्षात्कार है, जिसे आपको खबर के नाम पर दिखा दिया गया है। 5 मिनिट के व्यावसायिक विज्ञापन को जब हम देखते है तो जानते है कि, अमुक विज्ञापन के लिए अमुक कंपनी ने पैसा दिया है, अत: यह विज्ञापन सच्चा है। लेकिन इंटरव्यू का जो 5 करोड़ चुकाया गया उसके बारे में हमें जानकारी नहीं है। इस तरह यह एक पेड इंटरव्य (Paid Interview) है।

(१) यदि आप कोई सूचना खबर का लेबल लगाकर देना चाहते है तो आपको 2 से 10 गुणा तक ज्यादा दाम चुकाने होते है। खबरों की तुलना में विज्ञापनों के प्रसारण की दरे काफी सस्ती होती है। उदाहरण के लिए मान लीजिये कि कोई अभिनेता सेना को 20 लाख का दान देता है, और अब वह यह जानकारी देश के लोगो तक भी पहुँचाना चाहता है कि मैंने 20 लाख का दान दिया है। तो वह मीडिया से इसे खबर के रूप में दिखाने के लिए कहेगा। पेड मीडिया उससे 1 करोड़ रूपये लेगा और यह सूचना खबर के रूप में दिखायेगा कि अमुक अभिनेता ने सेना को 20 लाख का दान दिया है !!


तो मीडिया समूह ख़बरें बेचते है !! और उनकी ज्यादातर आय विज्ञापनों से न होकर खबरों को बेचने से ही होती है। यदि कोई मीडिया समूह सिर्फ विज्ञापनों से होने वाली आय पर निर्भर है तो उसे घाटा होना शुरु होगा, और अंततोगत्वा वह बंद हो जायेगा। इसीलिए मीडिया समूह अपना घाटा निकालने और मुनाफा बनाने के लिए राजनैतिक प्रायोजको को खबरें बेचते है।


(4) पेड मीडिया के प्रायोजक कौन है ?

मीडिया घाटे का कारोबार है। मीडिया समूहों का घाटा पूरा करने वाले समूहों के आधार पर भारत में मीडिया के 2 वर्ग है :-

• सरकारी मीडिया : दूरदर्शन नागरिको द्वारा वसूल किये गए टेक्स पर चलता है, अत: यह सिटिजन पेड मीडिया है। 

• प्राइवेट मीडिया : इनका घाटा धनिक वर्ग पूरा करते है, और वे ही सूचनाएं देने के लिए मीडियाकर्मीयों को भुगतान करते है।


लोकतंत्र आने के बाद से मीडिया समूह दुसरे नंबर की सबसे ताकतवर कम्पनियां बन गयी है। पहला नंबर हथियार बनाने वाली कम्पनियों का है। पिछले 200 वर्षों से वैश्विक राजनीती पर हथियार निर्माताओ का कब्जा है, और दुनिया में सबसे बेहतर हथियार बनाने वाली कम्पनियां अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिको के पास है। जो भी देश अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को टक्कर देने वाले हथियार नहीं बना पा रहा है, उन देशो के मीडिया को अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक नियंत्रित करते है। भारत भी हथियार निर्माण में काफी पिछड़ा हुआ है, अत: भारत के मीडिया को भी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक नियंत्रित करते है।

इन कम्पनियों का मुख्य एजेंडा वैश्विक एवं भारत पर आर्थिक-सामरिक-धार्मिक नियंत्रण बनाना है। पेड मीडिया के माध्यम से वे भारत की मुख्यधारा की सभी राजनैतिक पार्टियों एवं नेताओं को नियंत्रित करते है, ताकि इनका इस्तेमाल अपने हितो के लिए किया जा सके।


(4.1) पेड मीडिया को कौन नियंत्रित करता है?

राजतन्त्र में गेजेट छापने की शक्ति राजा के पास थी। राजा के पास सेना भी थी, और इसीलिए राजा ताकतवर था। 12 वीं सदी में यूरोप में जूरी सिस्टम आया, जिससे ब्रिटेन-फ्रांस ने तेजी से तकनिकी विकास करना शुरू किया और वे बेहतर हथियार बनाने लगे। 17 वीं सदी आते आते ब्रिटेन में निजी कम्पनियां बड़े पैमाने पर हथियार बनाने लगी थी, और 18 वीं सदी तक उन्होंने ऐसे निर्णायक हथियार बना लिए थे कि जिस सेना को वे अपने हथियार देना शुरू करते थे वह सेना जीतना शुरू कर देती थी।

उदाहरण के लिए 1805 से 1815 के बीच सिर्फ बर्मिघम के कारखानों ने ही लगभग 40,00,000 बन्दूको का उत्पादन किया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी इन्ही बन्दूको की सहायता से विभिन्न राजाओ की सेनाओं को हराकर अपने उपनिवेश स्थापित कर रही थी। बन्दूक निर्माण की दूसरी बड़ी कॉटेज इंडस्ट्री लन्दन में थी। लन्दन एवं बर्मिंघम में बंदूक बनाने के इन कारखानों के मालिको ने ही पूरी दुनिया में ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को सुनिश्चित किया।


उस समय बंदूक निर्णायक हथियार थी, और इसके उत्पादन पर नियंत्रण रखने वालो की ताकत को आप इस तरह समझ सकते है कि, यदि 1 लाख बन्दूको एवं कारतूस की पेटियों से भरा जहाज नवाब सिराजुद्दौला को सप्लाई कर दिया जाता तो क्लाइव लॉयड न तो प्लासी का युद्ध जीतता था और न ब्रिटिश भारत में घुस पाते थे। सिराजुद्दौला के पास यह अस्लहा आ जाता तो वह पूरे भारत को भी जीत सकता था। लेकिन पूरे भारत का बादशाह बनने के बाद भी क्या सिराजुद्दौला बर्मिंघम के फैक्ट्री मालिक से टकराव ले सकता था ? नहीं !! क्योंकि वे सिराजुद्दौला के प्रतिद्वंदियों को 4 जहाज भरकर बंदूक भेज देते, और सिराजुद्दौला के कारतूसो की सप्लाई रोक देते !! और इस तरह नवाब फिर से पिट जाता || क्योंकि असली ताकत तब आती है जब आप अपने हथियार खुद बनाते हो। ब्रिटिश लगातार इसीलिए जीत रहे थे क्योंकि उन्हें दुनिया में सबसे बेहतर बंदूके बनाने वाले स्वदेशी कारखानों के मालिको का समर्थन प्राप्त था। और ब्रिटिश इतने बड़े पैमाने पर बेहतर बंदूके इसीलिए बना पा रहे थे, क्योंकि उनके पास जूरी सिस्टम था। विश्व के शेष देशो में बदतर अदालतें एवं भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था होने के कारण शेष विश्व तकनिकी उत्पादन करने में ब्रिटिश की तुलना में पिछड़ गया।


दुसरे शब्दों में, 200 साल पहले ही राजा वगेरह नाम के राजा रह गए थे, और असली ताकत हथियार निर्माताओं के पास आ चुकी थी। पेड इतिहासकार इन तथ्यों को दर्ज नहीं करते, क्योंकि उन्हें यह जानकारी छिपाने के लिए भुगतान (Pay) किया जाता है।

बहरहाल, सिराजुद्दौला और भारत के अन्य राजाओं को बर्मिंघम एवं लंदन की हथियार बनाने वाली कंपनियों ने हथियार नहीं दिए, और वे हारते चले गए !! शिवाजी के पास पुर्तगाली तोपे थी, और यह एक बड़ी वजह थी कि वे मुकाबला कर पा रहे थे। बाजीराव को फ्रेंच कारखानों के मालिक तोपे सप्लाई कर रहे थे, और अहमद शाह अब्दाली के पास रशियन तोपखाना था। तो जो भी राजा उस समय जीत रहे थे उसकी निर्णायक वजह उनके हथियार आपूर्तिकर्ता थे। पिछले 200 सालो में हुए दुनिया के सभी युद्धों का अध्ययन यही बताता है कि, जिस देश को निर्णायक हथियार बनाने वाली कम्पनियों का सहयोग मिला हुआ है, वे देश युद्ध जीत जाते है, वर्ना हार जाते है !! 16 वीं सदी से पहले तक बड़ी सेना का महत्त्व होता था, लेकिन बाद में जैसे जैसे हथियारों की तकनीक उन्नत होती गयी वैसे वैसे युद्ध में निर्णायक भूमिका हथियारों की हो गयी। आज हथियारों की तकनीक इतनी आगे जा चुकी है कि निर्णायक हथियारों से लैस 5 हजार का दस्ता 50 लाख की सेना को खत्म कर सकता है। वो भी परमाणु अस्त्रो का इस्तेमाल किये बिना।


हथियार कम्पनियां एवं बड़े पैमाने पर कारखाने चलाने वाले धनिक वर्ग को सस्ता उत्पादन करने के लिए मुफ्त का कच्चा माल यानी खनिज चाहिए। जब उन्होंने निर्णायक हथियार बना लिए तो इन हथियारों का इस्तेमाल राजा को नियंत्रित (उपनिवेश की स्थापना आदि) करने में किया, ताकि अमुक देश के प्राकृतिक संसाधन एवं खनिज लूट सके। मताधिकार आने के बाद राजा की जगह पीएम ने ले ली, अत: उन्होंने लूट चलाने के लिए पीएम को नियंत्रित करना शुरू किया। पीएम को नियंत्रित करने के 2 तरीके है

या तो आपको पीएम को युद्ध में हराना होगा, 

या फिर चुनाव में।

यदि किसी देश का पीएम पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के खिलाफ जाकर पेड मीडिया को नियंत्रित की कोशिश करेगा तो उसे युद्ध में जाना पड़ेगा। दरअसल, निर्णायक हथियारों के अलावा ये कम्पनियां और भी ऐसी ढेर सारी तकनिकी वस्तुएं बनाती है जो दुनिया के ज्यादातर देशो को बनानी नहीं आती। और इन वस्तुओ के बिना न तो देश चलाया जा सकता है, और न ही बचाया जा सकता है। इसमें मुख्य रूप से हथियार, इंधन, दवाइयाँ, चिकित्सीय उपकरण एवं माइनिंग मशीनरी शामिल है। किन्तु निर्णायक बढ़त फिर भी इन्हें हथियारों से ही मिलती है। निचे कुछ ताकतवर कम्पनियों के बारे में सांकेतिक जानकारी दी है।


Paid Media Sponsor : Level 1 Weapon manufacturing 

Lockheed Martin, USA ($40.83 billion) 

Boeing, USA ($29.51 billion) 

Raytheon, USA ($22.95 billion) 

BAE Systems, USA ($22.79 billion) 

General Dynamics , USA ($19.23 billion) 

Airbus group, Trans-European ($11.2 billion)

और आधुनिक तकनीक पर नियंत्रण एवं एकाधिकार रखने वाली ऐसी 100 से 150 बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है जो अपना समूह (Lobby) बनाकर काम करती है। इन कंपनियों के कुल एसेट्स को आप जोड़ ले तो योगफल भारत के कुल विदेशी मुद्रा कोष से कहीं ज्यादा निकल जाएगा, और जहाँ तक ताकत की बात है इनमे से प्रत्येक कम्पनी की ताकत पूरे भारत देश से ज्यादा है। क्योंकि ये कम्पनियां ऐसी चीजे बनाती है, जो दुनिया के ज्यादातर देश नहीं बना पाते !!

(4.2) पेड मीडिया को नियंत्रित करने वाली कंपनियों का परस्पर शक्ति अनुपात

हथियार कंपनियों के अलावा अन्य औद्योगिक घराने एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी पेड मीडिया को पर्याप्त रूप से नियंत्रित करती है। किन्तु किसका नियंत्रण कितना है, यह पैसे से तय नहीं होता बल्कि शक्ति से तय होता है। उदारहण के लिए पतंजलि के पास हजारो करोड़ रूपये की संपत्तियां है, किन्तु पतंजलि मीडिया को निर्णायक रूप से नियंत्रित नहीं कर सकता। क्योंकि पतंजली की सभी फैक्ट्रियां ऑटोमेटेड आयातित मशीनों पर चलती है, और ये मशीने बनाने की तकनीक सिर्फ कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समूह x के पास ही है। अत: जब पतंजलि एवं समूह X में बुनियादी टकराव होगा तो पेड मीडिया समूह x की तरफ चला जाएगा। क्योंकि समूह X पतंजलि, निरमा, हमदर्द जैसी सैंकड़ो कंपनियों को ये ऑटोमेटेड मशीने सप्लाई करता है। यदि टकराव के कारण x पतंजली को इन मशीनों के स्पेयर पार्ट्स भेजना बंद कर देता है, और पतंजलि के अन्य प्रतिस्पर्धियो को मदद बढ़ा देता है तो अन्य प्रतिस्पर्धी पतंजलि के बाजार पर कब्जा कर लेंगे।


अब यदि आप सोचते है कि तब पतंजली किसी और कम्पनी से ये मशीने मंगा लेगा, तो ऐसा होना संभव नहीं है। क्योंकि भारत की कोई भी कम्पनी इस तरह की मशीने नहीं बनाती और दुनिया में भी सिर्फ गिनी चुनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास ही इन्हें बनाने की तकनीक है। अतः पतंजलि अपनी फैक्ट्रीयां चलाने और कारोबार को बढ़ाने के लिए तकनीक पर नियंत्रण रखने वाले विदेशी समूह X पर निर्भर है।

इसी तरह, यदि अम्बानी परिवार एवं रोकेफेलर परिवार में टकराव होता है तो अम्बानी को पीछे हटना पड़ेगा। क्योंकि रिलायंस की ऑयल रिफायनरी रोकेफेलर की कम्पनी की मशीनों पर चलती है। तेल निकालने की ये मशीने बनाने की तकनीक दुनिया में सिर्फ 20-25 कंपनियों के पास ही है। यदि रोकेफेलर तेल निकालने की मशीनरी महिंद्रा को देना शुरू कर देता है और रिलायंस को स्पेयर पार्ट्स भेजना बंद कर देता है तो अम्बानी परिवार तेल के धंधे से बाहर हो जाएगा। तो इस तरह विभिन्न कम्पनियां अपने शक्ति अनुपात के अनुसार मीडिया को कम-ज्यादा नियंत्रित करते है। किन्तु निर्णायक नियंत्रण हमेशा हथियार निर्माताओं का बना रहता है।

Power Controlling Levels over Paid Media; 

(A) Weapon, Manufacturers

(B) Pharma, Mining, Oil, Auto, High Tech MNCs

(C) Banking Co., Giant Zero Tech MNCs

(D) Tata, Ambani etc, Indian Companies


(5) पेड मीडिया के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :


(5.1) क्या सभी पत्रकार एवं सम्पादक आदि भ्रष्ट है ? क्या वे लोकतंत्र के प्रहरी एवं लोकतंत्र का चौथा खम्बा नहीं है ?

मुख्यधारा के सभी पत्रकार एवं संपादक पेड होते है। जो उन्हें Pay करता है उस हिसाब से रिपोर्टिंग करते है। जिस तरह अन्य प्रकार के कारोबार में कर्मचारी अपने मालिक के प्रति समर्पित होता है. उसी तरह से पत्रकार भी अपने नियोक्ता के हितों के लिए काम करते है। पत्रकारों पर लोगो के गुस्से की एक वजह यह है कि, राजनैतिक रूप से असूचित व्यक्ति इस गलत धारणा का शिकार है कि पत्रकार का काम नागरिको को सच्ची खबरें दिखाना है !! नागरिक पत्रकारो को 'लोकतंत्र का चौथा खम्बा, लोकतंत्र का प्रहरी और जनता का सिपाही' इसीलिए मानकर चलते है क्योंकि पेड मीडिया द्वारा उन्हें यह मानने के लिए सधाया गया है। वे बचपन से ही नागरिको को ये शब्द याद कराना शुरू कर देते है कि, मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्बा होता है !! और इसी वजह से आपको पत्रकारों पर गुस्सा आता है !! क्योंकि वे आपकी गलत कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे। तथ्य यह है कि, मीडिया हाउस भी अन्य कम्पनियों की तरह कारोबारी कम्पनियां है। वे मुनाफा बनाने के लिए मेहनत करते है, लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए नहीं || हालांकि छोटे स्तर के पत्रकार एवं सम्पादक आदि जनहित की सूचनाएं प्रसारित करते है। किन्तु इसकी ज्यादातर वजह यह होती है कि उनके पास ख़बरें बेचने का मौका नहीं होता। जैसे ही उन्हें अवसर मिलता है वे ख़बरें बेचना शुरू कर देते है। यदि छोटे पत्रकार धनिक वर्ग के हितो के खिलाफ काम करते है तो उनकी कभी तरक्की नहीं हो पाती, और वे हमेशा मुख्यधारा से बाहर ही रहते है।


(5.2) लेकिन कहा जाता है कि मीडिया का मुनाफा TRP से तय होता है ?

TRP वगेरह का प्रभाव विज्ञापनों की दरों को आन्तरिक प्रतिस्पर्धा के स्तर पर प्रभावित करता है, राजनैतिक खबरों को नहीं। भारत की मुख्यधारा में कुल जमा 25-30 चैनल एवं 50-60 समाचार पत्र है। यह संख्या बहुत छोटी है, और धनिक वर्ग मुख्यधारा के सभी (सभी से यहाँ आशय सभी से है। मतलब 30+60 = 90 ) मीडिया समूहों का घाटा पूरा करते है। लेकिन विज्ञापन दरों का भुगतान टीआरपी यानी की लोकप्रियता से तय होता है। अब यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि मीडिया चैनल्स की 90% आय का स्रोत राजनैतिक खबरें है, न कि विज्ञापन। और ज्यादातर मामलो में राजनैतिक खबरों के लिए पेमेंट करने वाली कम्पनियां ही विज्ञापन दाता भी होती है !! यदि मीडिया हॉउस पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के खिलाफ जाकर किसी खबर का प्रसारण करेगा तो उसे विज्ञापन भी नहीं मिलेंगे। इस तरह उसे न तो खबर दिखाने का पैसा मिलेगा और न विज्ञापन का। क्योंकि पेड मीडिया के प्रायोजको के खिलाफ खबर दिखाने से जनता तो किसी पत्रकार या मीडिया हाउस को अगले दिन को पैसा भेजने वाली नहीं है। दुसरे शब्दों में, आप पेड मीडिया में जो भी ख़बरें देखते है उनके लिए किसी न किसी के द्वारा भुगतान किया जाता है। कभी खबर सच्ची होती है, और कभी यह पक्षपातपूर्ण होती है। लेकिन दोनों ही स्थितियों में उन्हें पेमेंट अवश्य होती है। यदि पेमेंट नहीं होगी तो रिपोर्टिंग भी नहीं होगी। यदि चेनल की दर्शक संख्या कम होती है तो पेमेंट कम मिलेगी, और दर्शक संख्या अधिक होने पर खबरें दिखाने की दरें ऊँची होगी। यदि वे नागरिको को TRP का लॉलीपॉप नहीं देंगे तो नागरिको का दिमाग इस दिशा में सोचने लगेगा कि वे पैसा कहाँ से बना रहे है। और तब यह बात खुल जायेगी कि वे खबरें बेच रहे है।


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